
धम्मपद – पुप्फ वर्ग
को इमं पठविं विजेस्सति – यमलोकञ्च इमं सदेवकं
को धम्मपदं सुदेसितं – कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति ।
1. इस धरती को कौन जीतेगा ? स्वर्ग और नरक सहित सभी लोकों को कौन जीतेगा ? जैसे चतुर माली सुन्दर फुलों को चुनकर तोड़ता है, वैसे ही भली प्रकार से बताये गये इस अमृतमय बुद्धवाणी नामक सद्धर्म को कौन बोध करेगा ?
सेखो पठविं विजेस्सति – यमलोकञ्च इमं सदेवकं
सेखो धम्मपदं सुदेसितं – कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति।
2. आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने वाला श्रद्धावान ज्ञानी ही इस धरती को जीत लेता है। स्वर्ग और नरक सहित सभी लोकों को वही जीत लेता है। जैसे चतुर माली सुन्दर सुन्दर फुलों को चुनकर तोड़ता है, वैसे ही भली प्रकार से बताये गये इस अमृतमय बुद्धवाणी नामक सद्धर्म को वही बोध करता है।
फेणूपमं कायमिमं विदित्वा – मरीचिधम्मं अभिसम्बुधानो
छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि – अदस्सनं मच्चुराजस्स गच्छे।
3. इस शरीर को निस्सार फेन के समान समझना चाहिये। यह जीवन मरीचिका के समान है। इसे भलीभांति बोध करना चाहिये। पापी मार के माया युक्त क्लेश बंधन रूपी फुलों की माला है, उसे तोड़कर उस निर्वाण मार्ग की ओर जाना चाहिये, जिस निर्वाण को पापी मार को देखना असंभव है।
पुप्फानि हेव पचिनन्तं – ब्यासत्तमनसं नरं
सुत्तं गामं महोघोव – मच्चु आदाय गच्छति।
4. जैसे माली फुलोें की खोज में कई पौधों के पास जाता है, वैसे ही कामभोगों के सुख में फंसे लोग कामभोगों को ही खोज-खोजकर जाते हैं और अंत में जैसे गाँव के सोये लोगों को बाढ़ आकर समुद्र में बहा ले जाती है, उसी प्रकार पापी मार उन लोगों को दुर्गति दुखों में डूबा देता है।
पुप्फानि हेव पचिनन्तं – ब्यासत्तमनसं नरं
अतित्तं येव कामेसु – अन्तको कुरुते वसं।
5. जैसे माली फुलों की खोज में गाँव-गाँव जाता है, वैसे ही कामभोगों के सुख में फंसे लोग कामभोगों को ही खोज-खोजकर जाते हैं और अंत में वे लोग कामभोगों के प्रति बिना तृप्त हुये पापी मार के बंधन में फंस जाते हैं।
यथापि भमरो पुप्फं – वण्णगन्धं अहेठयं
पलेति रसमादाय – एवं गामे मुनी चरे।
6. जैसे भौरा फुलों की सुन्दरता और सुगन्ध को बिना हानि पहुँचाये फुलों का रस लेकर उड़ जाता है। वैसे ही तथागत बुद्ध के श्रावक भिक्षुगण गाँव में भिक्षाटन करते हैं।
न परेसं विलोमानि – न परेसं कताकतं
अत्तनोव अवेक्खेय्य – कतानि अकतानि च।
7. दूसरों की वाणियों में दोष ढूँढने से कोई लाभ नहीं। दूसरों के किये और ना किये को भी ढूढने से कोई लाभ नहीं। खुद के बारे में देख लिया तो पर्याप्त है। स्वयं क्या करता है तथा क्या नहीं करता है, उसे देख लिया तो पर्याप्त है।
यथापि रुचिरं पुप्फं – वण्णवन्तं अगन्धकं
एवं सुभासिता वाचा – अफला होति अकुब्बतो।
8. जैसे कोई पुष्प है, बहुत सुन्दर है, पर कोई सुगन्ध नहीं। वैसे ही भगवान बुद्ध के द्वारा अच्छी तरह से बताये गये श्री सद्धर्म के अनुसार अगर जीवन में आचरण नहीं करते हैं तो इससे कोई लाभ नहीं होता।
यथापि रुचिरं पुप्फं – वण्णवन्तं सगन्धकं
एवं सुभासिता वाचा – सफला होति पकुब्बतो ।
9. जैसे कोई पुष्प है, बहुत सुन्दर है और सुगन्ध युक्त भी है। वैसे ही भगवान बुद्ध के द्वारा बताये गये श्री सद्धर्म को अगर अपने जीवन में अमल करे तो सार्थक फल पा सकते हैं।
यथापि पुप्फरासिम्हा – कयिरा मालागुणे बहू
एवं जातेन मच्चेन – कत्तब्बं कुसलं बहुं।
10. जैसे कोई चतुर माली सुगन्धित फुलों को जमा करके बहुत मालायें बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य लोक में जन्मे मानव को जितना हो सके, उतना पुण्य करना चाहिये।
न पुप्फगन्धो पटिवातमेति – न चन्दनं तगरमल्लिका वा
सतं च गन्धो पटिवातमेति – सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवाति।
11. पुष्पों की सुगन्ध हवा के विपरीत दिशा में नहीं जाती। चन्दन, चंपा, कमल या जूही की सुगन्ध भी हवा के विपरीत दिशा में नहीं जाती। लेकिन सत्पुरूषों के गुणों की सुगन्ध तो हवा के विपरीत दिशा में भी जाती है। सत्पुरूष व्यक्ति सभी दिशाओं को सुगन्धित करता है।
चन्दनं तगरं वापि – उप्पलं अथ वस्सिकी
एतेसं गन्धजातानं – सीलगन्धो अनुत्तरो।
12. चन्दन, चंपा, कमल और चमेली की सुगन्ध से ज्यादा गुणवानों के शील की सुगन्ध होती है।
अप्पमत्तो अयं गन्धो – यायं तगरचन्दनी
यो च सीलवतं गन्धो – वाति देवेसु उत्तमो।
13. ये चन्दन और चंपा की सुगन्ध तो बहुत अल्प है। लेकिन शीलवानों के गुणों की सुगन्ध तो उससे उत्तम है। उनके गुणों की सुगन्ध देवलोक तक फैल जाती है।
तेसं सम्पन्नसीलानं – अप्पमादविहारिनं
सम्मदञ्ञा विमुत्तानं – मारो मग्गं न विन्दति।
14. वे मुनि लोग सदाचारी है। परम मुक्ति के लिये बिना देर हुये धर्म का आचरण करते हैं। वे भली प्रकार से परम सत्य का बोध होने के कारण सभी दुखों से मुक्त हो चुके हैं। उनके मार्ग को पापी मार कभी नहीं देख सकता है।
यथा सङ्कारधानस्मिं – उज्झितस्मिं महापथे
पदुमं तत्थ जायेथ – सुचिगन्धं मनोरमं।
15. रास्ते के किनारे कचड़े से भरा पानी का गड्ढ़ा है। उसी कचड़े भरे कीचड़ में कमल का फुल खिलता है। उस कमल के फुल से बहुत सुगन्ध फैलती है। वो देखने में भी सुन्दर लगता है।
एवं सङ्कारभूतेसु – अन्धभूते पुथुज्जने
अतिरोचति पञ्ञाय – सम्मासम्बुद्धसावको।
16. वैसे ही इस लोक में अविद्या रूपी अंधकार से ढके अज्ञानी लोग है, ठिक तृष्णा रूपी कीचड़ के गड्ढे के समान। लेकिन उसी लोक में भगवान बुद्ध के वैरागी श्रावक अपनी प्रज्ञा की महिमा से चमकते हैं, जैसे कीचड़ में कमल का फुल खिलता है।