भिक्षु थुल्लतिस्स की कथा

गुस्से से सोचोगे तो कभी शांति नहीं मिलेगी
मैत्री से सोचोगे तो हर पल शांति ही मिलेगी..!

गुस्से से सोचोगे तो गुस्सा कभी शांत नहीं होगा
मैत्री से सोचोगे तो गुस्सा तुरंत शांत हो जाएगा…!

पुण्यवान सज्जनों, पुण्यवान बच्चो, आपको पता होगा हमारे भगवान बुद्ध बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद कपिलवस्तु शहर पधारे। भगवान बुद्ध अपने पिता राजा शुद्धोदन, अपनी सौतेली मां देवी प्रजापति गोतमी, राजकुमारी यशोधरा जो पहले उनकी पत्नी थी, राजकुमार राहुल और बाकी सभी के प्रति अनुकंपा करके वहां पधारे, तब बहुत लोग श्रद्धा से भिक्षु बन गये।

शाक्य वंश वह वंश है, जिसमें भगवान बुद्ध का जनम हुआ। कोलिय वंश देवी महामाया का वंश है। रोहिणी नदी दोनों शाक्य-कोलिय कुलों के जनपदों में विशाल खेतों को भिगोते हुए बहती है। इसलिए कभी-कभी ग्रीष्म ऋतु में रोहिणी नदी में पानी सूख जाता है। फिर जब वे उस पानी को बांटने की कोशिश करते हैं, तो लड़ाई की शुरुआत होती है। जब ऐसी लड़ाई की शुरुआत होने वाली ही थी, तो भगवान बुद्ध ने हस्तक्षेप किया। लड़ाई खत्म हो गयी। शांति की स्थापना हुई। इसी खुशी में दोनों शाक्य-कोलिय कुलों में से पांच-पांच सौ राजकुमार भिक्षु बन गये । भगवान बुद्ध की एक बुआ का एक बेटा था। उसका नाम तिस्स कुमार था। महल की सुख-सुविधाओं में पले वह तिस्स कुमार भी भिक्षु बन गया, जो बहुत मोटा था।

उसे बहुत घमंड था, क्योंकि वह राजकुल से भिक्षु बना था। सभी लोग उसे थुल्लतिस्स कहते थे, क्योंकि वह मोटा था। थुल्ल मतलब मोटा। यह थुल्लतिस्स भिक्षु किसी का भी सम्मान नहीं करता। भगवान बुद्ध के रिश्तेदार होने के घमंड से वह अपने कर्तव्य का पालन न करते हुए उन कुर्सियों पर बैठकर श्रद्धालू लोगों से सत्कार-सम्मान पाकर खुश होता था, जिन पर बड़े -बड़े भिक्षु बैठते थे।

एक दिन, एक बहुत ही सुशील, गुणवान और महान भिक्षु आये। उस समय भिक्षु थुल्लतिस्स एक बड़ी कुर्सी पर बैठकर गंभीर लीला में था। उस महान भिक्षु ने थुल्लतिस्स भिक्षु के बारे में सोचा कि ये बड़े भिक्षु होंगे। तो वे भिक्षु थुल्लतिस्स के पास गये। फिर भी वह आसन से नहीं उठा। उसने बड़े भिक्षु का इज्जत नहीं किया। बड़े भिक्षु ने पूछा, “अब आपके कितने वर्षावास हो गये हैं?” तब थुल्लतिस्स भिक्षु तुरंत उठे और अपने छोटापन के बारे में बताया। तब उस बड़े भिक्षु ने थुल्लतिस्स को उपदेश दिया। “बहुत गलत। बहुत गलत……. एक भिक्षु को इस तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। जो सम्मान के पात्र हैं, उनका सम्मान करना चाहिए। जो पूजनीय हैं, उनकी पूजा करनी चाहिए। आगंतुकों की सेवा करनी चाहिए। विनम्रता से रहना चाहिए। नहीं तो कैसे भिक्षु जीवन श्रेष्ट होगा?”

भिक्षु थुल्लतिस्स इस उपदेश से क्रोधित हो गया। वह जोर से चिल्लाने लगा। रोने लगा। उसने सिर पे हाथ लगाया। वह रोते रोते तेजी से भगवान बुद्ध के पास गया।

उसने जाकर उस बड़े भिक्षु के विरुद्ध शिकायत की। महाकारुणिक भगवान बुद्ध ने तथ्यों की जानकारी करके उपदेश दी कि “हे तिस्स, बहुत गलत। बहुत गलत……. एक बड़े भिक्षु के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। जो सम्मान के पात्र हैं उनका सम्मान करना चाहिए। जिनकी पूजा करनी है, उनकी पूजा करनी चाहिए ।आगंतुकों का सत्कार करना चाहिए। विनम्र होना चाहिए। नहीं तो कैसे भिक्षु जीवन श्रेष्ट होगा? अब तुम उस बड़े भिक्षु से क्षमा मांगो।” तब थुल्लतिस्स ने भगवान बुद्ध का उपदेश को भी नहीं स्वीकारा। वह सोचता है कि उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है। भगवान बुद्ध ने बताया कि यह व्यक्ति पिछले जन्मों में भी गुणवान व्यक्तियों की बातें न सुनने के कारण और कठोर स्वभाव होने के कारण बड़ी मुसीबत में पड़ गया।” सबसे पहले उन्होंने सुंदर धर्म की ये दो गाथाएं कहीं ।

अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे।

ये तं उपनय्हन्ति वेरं तेसं न सम्मति।

अर्थ:

उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया, उसने मुझे गाली दी, उसने मुझे लूट लिया। जो व्यक्ति इस प्रकार हमेशा सोचते हुए क्रोध करता है, तो उसके जीवन से कभी भी वैर का अंत नहीं होता है।

अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे।

ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति।

अर्थ:

उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया, उसने मुझे गाली दी, उसने मुझे लूट लिया। जो व्यक्ति इस प्रकार न सोचते हुए क्रोध उत्पन्न नहीं करता है तो उसके जीवन से वैर का अंत हो जाता है।

वहाँ जो भिक्षु मौजूद थे, वे थुल्लतिस्स के पिछले जीवन की कहानी सुनना चाहते थे। महाकारुणिक भगवान बुद्ध ने वह बीती घटना बतायी।

एक समय की बात है, वाराणसी में कालदेवल नाम का एक ऋषि था। वह हिमालय वन में ध्यान करता था। बहुत दिनों के बाद वह कुछ स्वादिष्ठ भोजन करने के इरादे से वाराणसी शहर आया। चलते-चलते वह एक कुम्हार की शाला में रुका। उसी दिन नारद नाम का एक और ऋषि भी उस कुम्हार की शाला में रात बिताने आया। उसने कुम्हार से रुकने की अनुमति मांगी। तब कुम्हार ने कहा कि “यदि पहले आये हुए ऋषि से पूछ कर वह चाहे, तो रुक सकता है।” इसलिए नारद ऋषि ने पहले से आए हुए कालदेवल ऋषि से अनुमति ली और उस शाला में रुका। दोनों मित्र बन गए। बातचीत हुई। दोनों सो गये। जब नारद सो रहा था, तो कालदेवल भी पास ही सो रहा था। लेकिन रात को वह वहां से उठकर शाला के प्रवेश द्वार के बीच टेढ़े लेटकर सो गया। आधी रात में नारद को बाहर जाने की जरुरत पड़ी।

जब वह उठकर अँधेरे में शाला से बाहर जाने लगा, तो दरवाजे के पास सो रहे कालदेवल ऋषि की जटाओं को पैरों से दबाता हुआ बाहर चला गया। कालदेवल ऋषि जोर से चिल्लाया “अरे…कौन है? मेरी जटा को दबा रहा है ?”

“हे ऋषि, मुझे नहीं पता था कि तुम यहां सो रहे हो। मुझे क्षमा करो” कहकर नारद ऋषि बाहर चला गया। तब कालदेवल ऋषि ने सोचा कि “अब जब यह आदमी बाहर निकला, तो उसने मेरी परवाह किए बिना मेरी जटाओं को दबाते हुए निकला। जब वह वापस आएगा, तो भी वह मेरी जटाओं को दबाते हुए आएगा।” ऐसे सोचकर उसने जिस तरफ अपने पैर थे, उसी तरफ अपना सिर रखा और जिस तरफ अपना सिर था, उसी तरफ अपने पैर रखे और वह सो गया। वापस आकर नारद ऋषि ने कल्पना की कि ‘अगर इस तरफ से जाऊं तो उनका सिर फिर दब जाएगा। इसलिए जिस तरफ उनके पैर हैं, उसी तरफ से जाना चाहिए।‘ ऐसा सोचकर जब नारद ऋषि दूसरी तरफ से गया, तो उसके पैरों से जटा दब गया और कालदेवल ऋषि गुस्से से गुर्राया। “तू ने यह जानबूझकर किया। तूने फिर से मेरी गर्दन पर पैर रखा। देख तुझे मैं क्या करता हूँ।”

“हे ऋषि, मुझे क्षमा कीजिए। मैं ने सोचा कि जिस तरफ आपके पैर रखे थे इस बार उसी तरफ से जाऊंगा। मुझे नहीं पता था कि आप इसी तरफ अपना सिर रख कर सो रहे हैं। कृपया मुझे माफ कर दे।”

“क्षमा ? … तू जान लो। तू मेरे स्वभाव को जाने बिना मेरे सिर पर कदम रखा। तू कल का सूरज नहीं देख पाएगा। जब कल सूरज उगेगा, तो तेरा सिर सात टुकड़ों में फट जाएगा। ये निश्चित है” कह धरती पर हाथ फेर-फेर कर श्राप दिया।

नारद ऋषि चुप हो गया। अंदर जाकर बैठ गया और ध्यान लगाया। उसने ध्यान के बल से देखा कि अपने ऊपर लगाये गये दोष का श्राप किस पर लगेगा।

देखते-देखते नारद ऋषि को ज्ञात हुआ कि “अपराधी तो कालदेवल ही है। उसकी दुष्टता ही इसका कारण है। उसका वैरी मन ही इसका कारण है। इसलिए जब सूरज उगेगा, तो उसका ही सिर सात टुकड़ों में फट जाएगा।” नारद को कालदेवल पर बहुत दया आयी कि यह व्यक्ति व्यर्थ संकट में पड़ने जा रहा है। उसकी दुष्टता के कारण ही ऐसा हो रहा है। मुझे उसे बचाना चाहिए ।” सोचकर उसने अपनी ऋद्धि बल से सूर्योदय रोक दिया।

महल के आंगन में एकत्रित भीड़ शोर मचाने लगी। लोगों ने बनारस के राजा से विनती की। “हे प्रभु, यह क्या हुआ? यह अँधेरा मिटता नहीं। सूरज निकलता नहीं। कोई आपत्ति हुई है। हे प्रभु, हमें इससे बचाइए।” राजा घबरा गया। राजा ने तथ्यों की जांच की। अंत में राजा को पता चला कि एक कुम्हार की शाला में हिमालय वन से आये दो ऋषि हैं। राजा मशाल जलवा कर उनकी तलाश करते हुए गया। नारद ऋषि ने मामले को समझाया।

“हे राजन, मैंने कुछ भी गलत नहीं किया। जब मैं शाला से बाहर निकल रहा था, तो यह तपस्वी गलत जगह पर लेटा हुआ था, इसलिए मुझसे अनजाने में उसके सिर दब गया। मैंने माफी मांगी। लौटते समय उसने पहले जिधर पैर रखे थे, उधर से मैं आ गया। उस वक्त भी उसने अपना सिर उसी तरफ कर लिया था। फिर से सिर दब गया। मैं ने बड़ी विनम्रता से माफ़ी मांगी। उसने मुझे माफ नहीं किया। इसके बजाय उसने मुझे श्राप दिया कि जब सूरज उगेगा, तब मेरा सिर साथ टुकड़ों में फट जाएगा। लेकिन मैं ग़लत नहीं हूं। जब सूर्य का उदय होगा, तब उसका सिर ही फट जाएगा। उसके प्रति दया करके मैं ने ही सूर्योदय को रोक रखा है। अगर वह मुझसे माफी मांगेगा, तो संकट टल जाएगा।”

राजा कालदेवल ऋषि के पास गया और जाकर बहुत विनती की। राजा ने उससे प्रार्थना की कि नारद ऋषि के पास जाकर उनसे क्षमा मांगें। मूर्ख कालदेवल का मन राजा के आगमन से अहंकार से और भी ऊपर चढ़ गया। वह और भी अधिक घमंडी हो गया। वह माफी मांगना ही नहीं चाहता था। अंततः राजा को गुस्सा आ गया। वह कालदेवल को बलपूर्वक खींचकर ले गया और उसके माथे को नारद ऋषि के पैरों के सामने रख दिया। माफ़ी मंगवाया। नारद ऋषि ने माफी दे दिया। उसने कालदेवल ऋषि से कहा कि उसे अपने सिर के प्रमाण के मिट्टी का गोला सिर पर रखकर नदी में उतरना होगा। सूरज निकलते ही, उसे पानी में डूबने के लिए कहा, ताकि केवल मिट्टी का गोला पानी के ऊपर रहे। तभी नारद ऋषि ने ऋद्धि छोड़ दी। सूरज का उदय हुआ। कालदेवल के सिर पर रखा गया मिट्टी का गोला, जो पानी के ऊपर था, सात टुकड़ों में फट पड़ा।

पुण्यवान सज्जनो और पुण्यवान बच्चो, दुष्टता का प्रतिफल अद्भुत होता है। ऐसे कितने लोग हैं, जो व्यर्थ अहंकार, घमंड और अभिमान के कारण बड़ों की बात नहीं मानते? वे जीवन में हमेशा उलझनों में फंसे रहते हैं। नफ़रत करते हैं। बदला लेने की मौका ढूंढते रहते हैं। पाप करते हैं। इसलिए वैर न करना ही श्रेष्ठ है। अगर किसी ने आपको दुःख दिया भी हो तो उसके बारे में बुरा न सोचना महान है। नफरत छोड़कर मैत्री करना ही श्रेष्ठ है।

धम्मपद कथा

2 Comments

  • Pranav
    Posted September 4, 2024 2:30 am 0Likes

    Very inspiring story for everyone. Sadhu sadhu sadhu

  • Sanjeev Tyagi
    Posted September 4, 2024 8:02 am 0Likes

    I am working as an ‘Anaagaari’ under Bhante Gunanand ji in Nagpur .
    I love getting these Katha in my mail.

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