नफ़रत से नफ़रत कभी खत्म नहीं होती, नफ़रत खत्म होती है मैत्री करने से…!

उन दिनों हमारे भगवान बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन विहार में विराजमान थे। उस शहर में एक युवा दंपति बहुत खुशी से रहते थे। उनका एक सुन्दर बच्चा हुआ। एक दिन इस युवा माँ ने एक अद्भुत दृश्य देखी। पालने में सो रहे बच्चे के पास कोई खड़ी थी। दिखने में काला काला। दो बड़ी-बड़ी आँखें। लंबे दो दांत बाहर निकले हुए। उस समय मां डर गयी। वह चिल्लाते हुए घर के अंदर इसलिए भागी कि बच्चे को खतरा होगा। तभी स्पष्ट रूप से उसने देखी कि वह एक राक्षसी है। वह राक्षसी ज़ोर से हँसी और गायब हो गयी। उसने पास जाकर देखा तो बच्चा मर चुका था। राक्षसी ने बच्चे का खून पी चुका था।

वे माता-पिता खूब रोये। कुछ समय के बाद उन्हें फिर से एक बच्चा पैदा हुआ। वह राक्षसी प्रकट हुई। और उस बच्चे को भी मार डाली। उस वक्त भी माता-पिता खूब रोये। फिर उन्हें एक सुंदर बच्चा पैदा हुआ। माता-पिता बहुत डरे हुए थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था की उनके साथ ये हो क्या रहा है। बालक को हिरे की तरह प्रेम से सुरक्षित रखा गया।

एक दिन माँ बच्चे को स्नान घाट पर ले गयी। बच्चे को नहलाने के बाद मां नहाने लगी। अचानक माँ को दूर से एक काले बिंदु जैसी कोई चीज़ आती हुई दिखाई दी। माँ समझ गयी। “हे ! ..मेरे भगवान बुद्ध! .. अरे ! वह राक्षसी मेरे बच्चे को छीनने आ रही है।” माँ बिजली की तरह दौड़ी और बच्चे को गले से लगा लिया। वह एक ही सांस में सड़क पर दौड़ने लगी। लोग हैरान होकर देख रहे हैं। “कृपया… मेरे बच्चे को बचा लो।” माँ ऐसे चिल्लाती हुई सड़क पर भागती है। धीरे-धीरे राक्षसी, माँ के पास आ रही है। माँ बिना रुके सीधे जेतवन विहार में दौड़ी।

यह माँ का सौभाग्य है और बच्चे का भी सौभाग्य है की भगवान बुद्ध धर्म सभा मंडप में विराजमान थे। माँ रोते हुए दौड़ी और उसने बालक को भगवान बुद्ध के सामने रख दिया। “हे… मेरे भगवन, यह बच्चा आपको सौंपती हूं। आप इस बच्चे की रक्षा करें! हे मेरे भगवान बुद्ध, एक राक्षसी ने पहले मेरे दोनों बच्चों को खा लिया । राक्षसी इस बच्चे की बलि लेने के लिए फिर से आयी है।”

राक्षसी जेतवनाराम में प्रवेश नहीं हो पायी। वह द्वार पर खड़ी हो गयी। भगवान बुद्ध ने राक्षसी को बुलाया। और पास आने के लिए कहा। राक्षसी डरी हुई भयभीत हो कर भगवान बुद्ध के पास आयी, सिर झुकाकर वह आगे आ गयी और कोने में बैठ गयी।

“हे यक्षिणी, अब तुम्हें मैं जो गाथा सुना रहा हूं, उसे ध्यान से सुनो। इसका अर्थ याद रखो। तभी तुम इस पापी जीवन से मुक्त हो पाओगी। अब भी बच्चों को मारकर खाना बंद करो। इस नफरत को आगे मत बढ़ाओ। इस गाथा को अच्छी तरह समझ लो।

“न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो।

अर्थ:
वैर करने से वैर का कभी अंत नहीं होता। वैर का अंत वैर नहीं करने से होता है। यह सनातन धर्म है।

राक्षसी रोने लगी। उसने भगवान बुद्ध की वंदना की। इस बात को लेकर एकत्रित भीड़ में बड़ा कुतूहल जागा। किसी को समझ में नहीं आया कि समस्या क्या है? तभी भगवान् बुद्ध ने दोनों के पिछले जनम के बारे में एक घटना बताया की कैसे दोनों एक दूसरे से वैर करते हुए प्रतिशोध का शिकार होते आ रहे हैं।

यह घटना आज-कल की बात नहीं है। बहुत समय पहले इसी श्रावस्ती में यह राक्षसी और यह माँ एक ही परिवार की दो पत्नियाँ (सौतन) थीं। यह घटना कुछ ऐसी है।

एक अमीर आदमी ने एक महिला से शादी की। लेकिन उस महिला के कोई संतान नहीं थी। उनके माता-पिता इस बात से दुखी थे। वे झगड़ा करने लगे कि यदि कोई संतान न हुई, तो पीढ़ी नष्ट हो जायेगी। आख़िरकार वे एक और महिला घर में ले आये। उस महिला को काफी सत्कार मिला। पहली पत्नी दूसरी पत्नी से जलती थी।

“हे छोटी बहन, पुत्र- संपत्ति पाने में मैं भाग्यशाली नहीं हूं। लेकिन अगर तुम मां बनने वाली हो, तो मुझे बताओ। मैं तुम्हारी मदद करूंगी।”

कुछ समय के बाद दूसरी पत्नी गर्भवती हो गयी। वह बहुत खुशी थी। उसने सबको बताया। पहली पत्नी को भी बताया। तब पहली पत्नी की आंखें लाल हो गयीं। चेहरा चौड़ा हो गया। उसे जलन हो गयी। उसने चोरी छुपकर मां के गर्भ में ही बच्चे को मारने की दवा दे दी। बच्चा मर गया। माँ बहुत मुश्किल से बच गयी। इस बात का पता किसी को नहीं चला।

दूसरी पत्नी फिर गर्भवती हो गयी। वह फिर से खुश थी। उसने सबको बताया। उस बार भी पहली पत्नी ने चोरी छुपकर मां के पेट में बच्चे को मारने की दवा दे दी और उस बच्चे को भी मार दिया। उस वक्त घर के सभी को पहली पत्नी पर शक हुआ। लड़ाई हुई। कुछ समय बाद दूसरी महिला फिर से गर्भवती हो गयी। इस बार उसने किसी को नहीं बताया। उसने बहुत सावधानी से बच्चे की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत की।

लेकिन जब बच्चा मां के गर्भ में बड़ा होता था, तो मां का गर्भ भी आगे निकलता था। तब उस दुष्ट स्त्री को यह रहस्य मालूम हुआ। उसके बच्चे को मारे बगैर उसे शांति नहीं मिलती। वह फिर से एक उपाय लगाकर चोरी छुपकर बच्चे को मारने के लिए दवा दे दी। माँ के गर्भ में ही बच्चा मर गया। लेकिन वह बच्चा माँ के गर्भ में बड़ा हुआ बच्चा था, इसलिए माँ की भी मृत्यु होने वाली थी। उस माँ का दुःख, दर्द और प्रकंपन अपार है। उसने द्वेष से अपनी आँखें बड़ी कर लीं। वह विलाप करने लगी, चिल्लाने लगी। उसने दांत पीसते हुए ऐसा कहा,

“अरे… चांडालीन … तू जान ले। तूने ही मेरे पहले दोनों बच्चों को गर्भ में ही मार डाला। इस बार भी तूने मुझे और बच्चे दोनों को मार डाला। अरे चांडालीन … मैं जनम जनम तक तुझसे बदला लूंगी। मैं तेरी बच्चों को भी मार डालूंगी। तुझे भी मार डालूंगी। याद रखना। मैं तुझे और तेरे बच्चों को छोडूंगी नहीं।” कहकर वह भी मर गयी।

बाद में वे दोनों जानवर होकर पैदा हुई और एक-दूसरे के बच्चों को मारते हुए खा गयीं। इस बार वह महिला राक्षसी के रूप में पैदा हुई, जो पहले मां बनी थी। पर वह औरत एक मानव रूप में पैदा हुई, जो औरत पहले बच्चों की मृत्यु होने की दवा दी थी। इस बार भी वह राक्षसी दो बच्चों को मार डाला। जब वह राक्षसी तीसरा बच्चा भी मारने वाली थी, तब यह माँ जेतवन विहार में भाग आयी।

जब भगवान बुद्ध ने इनके पिछले जीवन की कहानी सुनायी, तो राक्षसी रोने लगी। वह माँ भी रो पड़ी। मन में उत्पन्न नफरत कितनी दूर तक जाती है, हम सोच भी नहीं सकते ! जनम जनम तक पीछे पड़े रहते है, मानो यह एक आदत हो। क्या नफरत इतनी खतरनाक है? मन में किसी के प्रति वैर बांध लेने पर वे आपस मिलते हीं है, चाहे मनुष्य योनि, पशु योनि, प्रेत योनि या किसी भी योनि में जनम लें। बदला लेते हैं। पीड़ा सहते हैं। इसका कोई अंत नहीं है। पुण्यवान सज्जनो, पुण्यवान बच्चो, यह एक सनातन धर्म है कि नफ़रत से नफ़रत कभी शांत नहीं होती। नफ़रत न करके नफ़रत को शांत करना भी सनातन धर्म है। नफ़रत न करना ही श्रेष्ठ है। तभी शांति की प्राप्ति होती है।

नफ़रत के ज़हर को खत्म करने वाला महान औषध।

अगर नफ़रत पैदा हो, तो सबसे अच्छा काम है मैत्री फैलाना। उस मैत्री के कारण भी वैर दूर हो जाता है।

कभी-कभी, यदि आप मैत्री फैलाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, तो भी वैर ही उभर सकता है। तब उस व्यक्ति पर करुणा जगानी चाहिए। यदि करुणा बढ़ाये, तो उसके कारण भी नफ़रत मिट जाता है।

कभी कभी जब आप करुणा उत्पन्न करने की कोशिश करेंगे, तब भी नफ़रत जागनेवाली बात ही बार-बार उभर आ सकती है। तब आपको उस व्यक्ति के प्रति उपेक्षा से देखना चाहिए। इसका मतलब कि ‘हमें उसके बारे में सोचने से कोई फायदा नहीं। हमें अपने काम पर ध्यान देना चाहिए’ ऐसा सोच कर मन को मध्यस्थ करना चाहिए। तब नफ़रत मिट जाता है।

पर कभी कभी इतना कुछ सोचने के बाद भी मन में वैर ही जागते रह सकता है। तो उस समय वैर उत्पन्न होने वाली बातें न सोचकर दूसरी बात याद करनी चाहिए। नफ़रत पैदा करने वाले व्यक्ति के बारे में न सोचकर दूसरी बात की याद लगातार करते रहने से नफ़रत खत्म हो जाती है।

पर शायद तब भी यह नफ़रत शांत नहीं हो पाती है, तो फिर आपको उसके बारे में ऐसा सोचना चाहिए “कोई भी व्यक्ति सोच-समझकर जो कुछ भी करता है, उसे विरासत के रूप में वही मिलता है। यह व्यक्ति भी उससे मुक्त नहीं हुआ है। इस आदमी का भी ऐसा जीवन है, जो कर्म ही उसे विरासत में मिला है। कर्म ही जन्म-स्थान है। कर्म ही दहेज़ है। यदि अच्छे कर्म करे, तो अच्छा प्रतिफल मिलेगा। यदि बुरा कर्म करे, तो उसे बुरा प्रतिफल मिलेगा। बस, वही उसका दहेज बनता है।” ऐसा सोचकर उत्पन्न नफरत को पूर्ण रूप से मिटाना चाहिए। प्रज्ञा से देखना चाहिए कि नफरत के कारण किस प्रकार हम दुख में पड़ते हैं। हमें डर होना चाहिए कि नफरत के कारण कैसा भयानक परिणाम मिलता है। और यह सोचकर खुश होना चाहिए कि नफरत छोड़ने से कैसे शांति, ख़ुशी मिलती है। तब, जैसे भयानक जानवर को खाना नहीं मिलने पर मर जाता है, वैसे ही नफरत भी मन से मिट जाएगी।

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