पुण्यवान सज्जनों, उस समय श्रावस्ती में महा सुवण्ण नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसका कोई संतान नहीं था। एक दिन जब वह घाट से स्नान करके वापस लौट रहा था, तो उसे एक विशाल वट वृक्ष दिखाई दिया, जिसकी शाखाएँ चारों ओर फैली हुई थीं । उसने सोचा ‘इस वृक्ष में महा बलशाली देवताओं के निवास होंगे।’ ऐसा सोचते हुए, उसने उस पेड़ के नीचे सफाई की, सफेद रेत बिछाई और सुंदर झंडियों से सजाया। उस वट वृक्ष का अभिवादन करके उसने ऐसा वर माँगा कि “हे वृक्षदेव, अगर मुझे बेटी या बेटा हुआ तो मैं आपकी बहुत पूजा करूंगा।”

कुछ समय बाद महा सुवण्ण की पत्नी को एक बेटा हुआ। महा सुवण्ण बहुत खुश है। उसने सोचा कि वृक्षदेवता के आशीर्वाद से ही मुझे बच्चा मिला है। बरगद पेड़ का सत्कार और उसकी पूजा करने की वजह से वह पैदा हुआ था। इसलिए, उस बच्चे का नाम उस अर्थ में ‘पाल’ रखा गया। कुछ दिनों के बाद एक और बेटे का जन्म हुआ। तब उसने अपने सबसे बड़े बेटे का नाम “महापाल” रखा। छोटे बेटे का नाम ‘चुल्लपाल’।

पुण्यवान सज्जनों, उस समय जब हमारे शास्ता भगवान बुद्ध दुनिया के प्राणियों के प्रति बड़ी करुणा के साथ छोटे – बड़े गांवों में पैदल चलकर धर्म का प्रचार कर रहे थे, तब ये दोनों चुल्लपाल और महापाल शादीशुदा होकर खुशी से जीवन बीता रहे थे। एक दिन बड़ी संख्या में लोग जेतवन विहार में प्रवचन सुनने जा रहे थे। तभी महापाल ने उन्हें देखा। उसे भी प्रवचन सुनने की इच्छा हुई। वह जेतवन विहार गया। एक कोने में खड़ा होकर प्रवचन सुनने लगा। अर्थों का स्मरण किया। धीरे-धीरे समझ गया। उसी वजह से वह श्रद्धा में आ गया और उसने त्रिशरण की शरण ली। अंत में उसने भिक्षु बनने का निर्णय लिया। वह आदरपूर्वक भगवान बुद्ध के पास गया और नमन करके भिक्षु बनने की प्रार्थना करने लगा। भगवान बुद्ध ने कहा “महापाल, क्या तुम्हारे घर में कोई जिम्मेदार व्यक्ति है, जिसे तुम अपनी इच्छा जाकर सूचित कर सको ?” महापाल ने कहा “हाँ भगवन, मेरा एक छोटा भाई है।” “तो महापाल, तुम जाकर छोटे भाई को बता दो।”

तब महापाल घर चला गया। सारे परिवार और अपने भाई को बुलाया और ये बात कही “छोटा भाई, ये सभी सजीव और निर्जीव संपत्तियाँ तुम्हारी हैं। तुम इन सभी लोगों की मदद करते रहो।”

“भैया, तुम इस तरह क्यों बदल गये?”

“भाई, मैंने तय कर लिया है कि मुझे भगवान बुद्ध के पास भिक्षु बनना है। मुझे इस संसार से बचने का एक दुर्लभ अवसर मिला है।”

“ओह, भैया , ऐसा मत करो। माँ और पिता जी के जाने के बाद, मेरे लिए माँ और पिताजी तुम ही थे। इसलिए घर में रहकर भी पुण्य कर सकते हो न? भिक्षु बनने की क्या जरूरत है ?”

‘“नहीं भाई, इस धर्म का आरंभ भी सुंदर है, मध्य भी सुंदर है, और अंत भी सुंदर है। इस राह पे चलने से किसी का जीवन व्यर्थ नहीं जाता। इस धर्म को इसी जीवन में ही समझा जा सकता और अनुबोध किया जा सकता है। लेकिन गृहस्थ जीवन में रहकर ऐसा करना संभव नहीं है। साथ ही, बुढ़ापे में जिस समय अपना हाथ पैर उठाने के लिए भी ताकत नहीं है, उस समय भिक्षु बनना मुश्किल होता है। इसीलिए मैंने भिक्षु बनने का निर्णय लिया।” अत: महापाल के विचार से परिवार के सभी सदस्य रो रोकर सहमत हो गये।

महापाल बहुत खुशी से भगवान बुद्ध के पास गया। भिक्षु बना, उसकी उपसंपदा हो गयी। उपाध्याय की आज्ञा का पालन करके पाँच वर्ष तक धर्म-विनय की शिक्षा ली। इसके बाद उसने एकांत में रहना पसंद किया और भगवान बुद्ध के पास गया। उसने आदरपूर्वक नमन करते हुए कहा “भगवन, मैं लगातार धर्म का अध्ययन करने में समय नहीं बिता सकता। मैं ध्यान लगाना चाहता हूँ। कृपया मुझ पर दया करें और मुझे इसके लिए सलाह दें” भगवान बुद्ध जी से उपदेश लेकर वह साठ अन्य भिक्षुओं के साथ यात्रा पर निकल पड़ा। उसने कोसों दूर की यात्रा की। श्रद्धावान लोगों ने अच्छे आचरणों और व्यवहारों से संपन्न इन भिक्षुओं को देखा, उन्हें बहुत अच्छा लगा और वे बहुत खुश हुए। उन्होंने खान-पान से सत्कार किया। “हमारे भिक्षुगण कहाँ पधार रहे हैं?”

“उपासको, हम वर्षावास बिताने के लिए उचित जगह ढूँढ़ रहे हैं।”

“तो भंते, हम लोगों पर दया करके कृपा कर इन तीन महीनों तक यहीं रहें। तब हमें प्रवचन भी सुनने का मौका मिलेगा और ध्यान करने मौका भी। साथ ही साथ दान देने का दुर्लभ भाग्य भी हमे मिलेगा।”

इन भिक्षुओं ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया। श्रद्धालु ग्रामीणों ने तुरंत कुटियाँ बना लीं। चंक्रमण स्थल बनाये। ध्यान कक्ष बनाये। उस गाँव में एक चतुर वैद्य है। उसने भी मदद की। उसने कहा, “हे भिक्षुगण, मैं आप लोगों की किसी भी बीमारी को ठीक कर दूँगा। बस मुझे बताइएगा ।”

वर्षावास आरम्भ होने के पहले दिन भन्ते महापाल ने अन्य भिक्षुओं को संबोधित किया। “प्रिय आयुष्मान, आप इन तीन महीनों में कितनी मुद्राओं (शारीरिक मुद्राएँ जैसे चलना, बैठना, खड़ा होना, लेटना)) में समय बिताने की योजना बना रहे हैं?”

“भन्ते, हम चार मुद्राओं में समय बिताने के बारे में सोच रहे हैं।”

“प्रिय आयुष्मानों, मैंने सोचा कि मैं इस धर्म को बोध करने के लिए जितना संभव हो सके उतना खुद को समर्पित करुंगा। हमे जीते जी साक्षात् भगवान बुद्ध का दर्शन मिला। हमें इस महान धर्म को उनके मुख से सुनने को मिला। हम श्रद्धा सम्पन्न हो गये। क्षण सम्पत्ति मिल गयी । अब तो प्रमाद होना खतरनाक है। प्रमादी प्राणियों के लिए चारों नरक के द्वार खुले हैं। इसलिए मैंने तीन मुद्राओं में समय बिताने का निर्णय लिया। इन तीन महीनों में लेटने की मुद्रा त्याग कर दूंगा।”

“जी भंते, अप्रमादी होना ही अच्छा है।” कहकर वे भिक्षु लोग भी सहमत हुए।

तो पुण्यवान सज्जनो, भन्ते महापाल ने पहले महीने में अच्छी तरह से ध्यान लगाया। दूसरे माह के प्रथम सप्ताह में नेत्र रोग हो गया। दोनों आँखों से ऐसे आँसू बह रहा है, जैसे किसी छेदी हुई गगरी से पानी बह रहा हो।

पूरी रात चलने, बैठने और ध्यान लगाने के बाद, सुबह वह भिक्षाटन के लिए तैयार हुआ। महापाल भिक्षु की आँखों से आँसुओं की धारा गिरती देखकर बाकि भिक्षुओं ने पूछा कि “भंते, आपको यह क्या हो गया?”

“प्रिय आयुष्मानो, लगता है कि इन आँखों को वात रोग हो गया है।”

“भंते, जब हम पहली बार वर्षावास में थे, तब एक वैद्य ने हमारा इलाज करने का वादा किया था। तो हम जाकर उससे कहें।” महापाल भन्ते जी उससे मिलने के लिए पधारे। उस डाक्टर ने महापाल भन्ते जी को अत्यंत मूल्यवान तेल दिया।

“भन्ते जी यह तेल एक महान तेल है, जिसने हमारी वैद्य पीढ़ी की इज्जत बचायी है। अब आप सुबह उस तेल की एक बूँद लें और लेटकर अपनी आँखों में डालें।”

भन्ते महापाल कुटि में गये और बैठे-बैठे ही अपनी आँखों में तेल डाल दिया। कुछ दिनों के बाद वैद्य ने भन्ते जी से पूछा, “भंते जी, अब नेत्र रोग कैसा है?”

“उपासक, आँखों में अब भी दर्द है।”

“भन्ते जी, ऐसा होना असंभव है। वह तेल आँखों की बीमारी को एक ही बार में ठीक कर देता है। आपको ऐसे कैसे हुआ? भन्ते जी, क्या आपने बैठकर तेल डाला था या लेटकर?” तब भन्ते महापाल जी चुप हो गये। बार-बार पूछा। लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया। अगले दिन वैद्य उस कुटि में गया, जहाँ भन्ते जी रह रहे थे। उसने हर जगह इधर-उधर देखा। पर उसे लेटने की जगह नहीं मिली।

“भन्ते जी आपने वह तेल बैठे-बैठे डाला था न?” भन्ते महापाल जी चुप हो गये।

“हे भन्ते जी, अपनी आँखों में वह तेल बैठकर मत डालिए। अगर आप अपने शरीर के स्वास्थ्य का अच्छे से ख्याल रखेंगे तो आप अच्छे से भिक्षु-धर्म की रक्षा कर पाएँगे। इसलिए लेटकर ही अपनी आँखों में तेल डालिये।” तब भन्ते महापाल ने उत्तर दिया, “उपासक, मैं इस बारे में बात करूँगा।” वैद्य चला गया।

भन्ते महापाल किससे बात करें? उनके कोई रिश्तेदार नहीं। भन्ते जी ने अपने आप से बात की। “हे पाल, तू ही बता कि क्या वे दोनों आँखें तेरे लिए कीमती हैं या यह बुद्ध-शासन, जो दुर्लभ से मिला है? जबकि तू इस जनम- मरण के चक्र में अनेको बार पैदा होकर मर गया, तब तेरे अनगिनत आँखें और कान थे न? कितने भगवान बुद्ध दुनिया में जनम लिए और परिनिर्वाण हो गए। उनमें से एक भी भगवान बुद्ध के निकट में रहकर आर्य अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण तू नहीं कर सका। तू चार आर्य सत्य को नहीं बोध कर सका। क्या तू इस जीवन में इस मौके को खोना चाहता है? इन तीन महीनों में तू नहीं लेटेगा। तूने संकल्प किया है कि मैं तीनों महीनों में न लेटूँगा । केवल तीन आसनों में रहूँगा। तेरी आँखे नष्ट होगी तो हो जाने दे नष्ट ! पर अपने संकल्प से पीछे मत हट। बुद्ध की आज्ञा का पालन कर।” उसने खुद को चेतावनी दी। इस प्रकार अपने आप से बातचीत करने के बाद उन्होंने ये गाथाएँ कहीं।

“चक्खूनि हायन्तु ममायितानि,
सोतानि हायन्तु तथेव कायो
;
सब्बम्पिदं हायतु देहनिस्सितं
,
किं कारणा पालित त्वं पमज्जसि।

“ममत्व द्वारा पकड़ी गई ये आँखे नष्ट हो जाये। साथ ही साथ शरीर और कान भी नष्ट हो जाये। इस शरीर से जुड़ा सब कुछ नष्ट हो जाए। हे पालित, तुम प्रमाद क्यों कर रहे ?”

सोतानि जीरन्तु तथेव कायो;
सब्बम्पिदं जीरतु देहनिस्सितं,
किं कारणा पलित त्वं पमज्जसि।

“ममत्व द्वारा पकड़ी गई ये आंखे जीर्ण हो जाये। साथ ही साथ शरीर और कान भी जीर्ण हो जाये। इस शरीर से जुड़ा सब कुछ जीर्ण हो जाये। हे पालित, तुम प्रमाद क्यों कर रहे ?”

“चक्खूनि भिज्जन्तु ममायितानि,
सोतानि भिज्जन्तु तथेव कायो;
सब्बम्पिदं भिज्जतु देहनिस्सितं,
किं कारणा पालित त्वं पमज्जसि” ति।

“ममत्व द्वारा पकड़ी गई ये आँखे टूट-फूट जाये। साथ ही साथ शरीर और कान भी टूट-फूट जाये। इस शरीर से जुड़ा सब कुछ टूट-फूट जाये। हे पालित, तुम प्रमाद क्यों कर रहे ?”

थेर महापाल ने अपने आप से ऐसी बातें करने के बाद बैठकर ही अपनी आँखों में दवा डाली।

वे भिक्षाटन में गये। भन्ते जी का नेत्र रोग बढ़ता जा रहा था। वैद्य ने चलकर उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछा। “उपासक, यह नेत्र रोग तो कम नहीं हो रहा है। लगातार दर्द होता रहता है।”

”भंते जी बैठ कर आँखों में दवा नहीं डाली है न?” भन्ते जी चुप हो गये। डाक्टर निराश हो गया। ”भंते जी, यदि आप सावधान न रहे, तो मैं कुछ नहीं कर सकता । आज से आप यह न कहें कि उस डाक्टर ने इलाज किया। मैं भी नहीं कहूँगा कि मैंने आपका इलाज किया है।” कहकर डाक्टर चला गया। महापाल भन्ते जी कुटि में गये और बैठकर सोचने लगे। ‘वैद्य जी ने भी मुझे अस्वीकार कर दिया। वैसे भी मैं तो मरने वाला हूँ। चार सतिपट्ठान में मन लगाने में मुझे और भी देर नही करना चाहिए’ कहकर वे लगातार ध्यान लगाते रहते थे। वर्षावास समाप्त होने की अंतिम रात को महापाल भन्ते जी की आँखें हमेशा के लिए अंधी हो गयीं। उसी क्षण, उनका मन सभी विकारों से मुक्त हो गया। वे अरहंत हो गए । उस दिन वे अपनी कुटि से बाहर नहीं आये। भिक्षाटन का समय आ गया। अन्य भिक्षुओं ने उन्हें भी भिक्षाटन के लिए बुलाया। उन्होंने उत्तर दिया, “प्रिय आयुष्मानो, आप लोग पधारें।”

“क्यों भंते जी, आप नहीं पधारेंगे?”

“प्रिय आयुष्मानो, मेरी आँखें अंधी हो गयीं।” तब भिक्षु लोग उनकी उन दोनों आँखों को देखकर बहुत दुखी हुए, जो आँसुओं से भरी हुई थीं। “भंते जी, आप उसकी चिंता मत कीजिए। हम आपकी सेवा करेंगे।” कहकर उनकी सेवा करके भिक्षाटन के लिए पधारे।

ग्रामीणों ने उनके बारे में जानकारी माँगी। वे दुखी थे कि उनकी आँखें अंधी थीं। भन्ते जी को देखने के लिए आकर वे विलाप करने लगे “भन्ते जी, कोई बात नहीं है कि आपकी आँखें अंधी हो गयीं। हम जीवन भर आपकी सेवा करेंगे।” उन श्रद्धालु ग्रामीणों ने उनकी देखभाल की। वे “चक्खुपाल थेर” के नाम से प्रसिद्ध हो गये, क्योंकि वे अंधे थे।

चक्खुपाल की वीरतापूर्ण सलाह लेने के बाद अन्य सभी भिक्षु भी अरहंत बने। वर्षावास के अंत के बाद, उन भिक्षुओं ने भगवान बुद्ध के दर्शन करने का इरादा किया। चक्खुपाल भन्ते जी इससे खुश थे। “ठीक है, प्रिय आयुष्मानो, वे हमारे शास्ता, अरहत, सम्मा सम्बुद्ध हैं, जिन्होंने निर्वाण मार्ग को स्वयं ढूंढा है, जिसे दुनिया में किसी और ने नहीं ढूंढा। वे निर्वाण के उस मार्ग के बारे में बताते हैं, जिसे किसी ने नहीं बताया। वे निर्वाण के उस मार्ग में विश्व के प्राणियों को चलाने में अत्यंत कुशल हैं। वे देखने वालों के मन को प्रभावित कर देते हैं। उनके आचरण बिल्कुल परम पवित्र हैं। उनकी बातें प्रज्ञा बढ़ानेवाली हैं। दुनिया के एकमात्र ज्ञानचक्षु हैं। साधु। साधु। मेरे नाम से भी उन महान शास्ता की वंदना करना। प्रिय आयुष्मानो, अब मैं कमजोर हूँ और जंगल के बीच की उन लंबी यात्राओं के दौरान अमनुष्यों की परेशानियां भी हो सकती हैं। अगर मैं उस यात्रा पर आऊं, तो सभी लोग मुसीबत में पड़ेंगे। भिक्षाटन भी ठीक समय पर कर नहीं पायेंगे । इसलिए आप लोग पहले ही पधारिए।”

“भंते जी, ऐसा मत कहिए। हम सब एक साथ ही यहा आये। और हमें एक साथ ही चलना चाहिए।”

“नहीं… प्रिय आयुष्मानो, आप लोगों को ऐसा सोचने की ज़रूरत नहीं है। तब यह मेरे लिए भी कठिन है। मेरा भाई जब भी आप लोगों को देखेगा, तो जरूर मेरे बारे में पूछेगा। तब उससे कहना कि मेरी आँखें अंधी हो गयीं हैं। तब वह यहाँ किसी को भेजेगा।” तो फिर उन भिक्षुओं ने आदर से भन्ते चक्खुपाल की वंदना की और जाने के लिए तैयार हो गये। उनके जाने से गाँववाले बहुत दुखी हुए। वे सड़क तक उनका पीछा करते रहै और रोते रोते उन भिक्षुओं की तरफ़ देख रहे थे।

वे भिक्षु लोग श्रावस्ती के जेतवन विहार में पधारे। उन्होंने तथागत भगवान बुद्ध की वंदना की। अगले दिन उन भिक्षुओं ने उस गली में भिक्षा माँगी, जहाँ चक्खुपाल भन्ते जी के भाई का घर था। चूलपाल ने इन भिक्षुओं को पहचान लिया। उसने अपने भाई भन्ते के बारे में पूछा। भन्ते चक्खुपाल के अंधेपन के बारे में सुनकर वह रोने लगा। अंततः उसने अपने एक चचेरे भाई को उस गाँव में भेजने का निश्चय किया। उसने अपने चचेरे भाई से कहा की “अभी लंबे रास्ते पर जाना है। इसके लिए सबसे अच्छी बात यह है कि आप एक भिक्षु के रूप में जाएँ न कि एक आम आदमी के रूप में।” तो इस यात्रा के लिए वह आधा महीने तक उन भिक्षुओं के पास रह गया। वह भिक्षु बना।

उसने चीवर पहनने करने का तरीका सीखा। रीति-रिवाजों के बारे में सीखा। उसके बाद वह चक्खुपाल भिक्षु की तलाश में निकल पड़ा। उसने चक्खुपाल भन्ते जी से मुलाकात की और कई हफ्तों तक उनकी सेवा की। उसने चक्खुपाल भन्ते जी से कहा “भंते जी, हमारे घरवाले आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, इसलिए हम जल्द ही जाएँ।”

“ठीक है आयुष्मान,” कहकर उन्होंने अनुमति दी। उन्होंने अपनी लाठी का एक कोना इस नये भिक्षु को दे दिया। उन्होंने स्वयं दूसरा कोना पकड़ लिया। भन्ते चक्खुपाल को भी गाँव छोड़कर जाते हुए देखकर गाँववाले बहुत दुःख से रोने लगे। गाँववाले उनके पीछे पीछे गये और तब तक वे हाथ जोड़कर रोते रहे, जब तक भन्ते जी दिखाई न दें।

जंगलों और निर्जन गाँवों के होते हुए चलनेवाली इस यात्रा के दौरान उस भिक्षु का मन अनेक भावनाओं में खो गया था, जो चार सतिपट्ठान पर ध्यान नहीं लगाता। उस जंगल में लकड़ी काटती एक स्त्री के मधुर स्वर में गाने की आवाज सुनकर उस नये भिक्षु का मन मुग्ध हो गया। “भंते, मैं शौचालय जाना चाहता हूँ। इसलिए आप कुछ देर यहीं रुकें।” कहकर चक्खुपाल भन्ते जी को वहाँ रोककर वह भिक्षु उस वन की ओर चल दिया, जहाँ वह महिला गा रही थी। भन्ते चक्खुपाल जी उसके पैरों की आहट सुनकर समझ गये कि यह युवा भिक्षु अपना शुद्ध शील भंग करने जा रहा है। युवा भिक्षु अपना ब्रह्मचर्य भंग कर वापस आकर लाठी का कोना पकड़ना चाहा, तब भन्ते चक्खुपाल कहते है “हट जाओ ! इस लाठी के कोने को मत पकड़ो। तुम अभी एक बड़ा पाप कर्म करके आ रहे हो न?” उन्होंने बार बार पूछा। पर नये भिक्षु ने कुछ भी नहीं कहा। चुपचाप रहा ।

भन्ते चक्खुपाल ने इस दुष्ट भिक्षु द्वारा अपनी लाठी का कोना पकड़ जाने पर पूरी तरह से मना किया । “आयुष्मान, मत करो… तुम्हारे साथ मेरी यात्रा अब ख़त्म। पापी तो पापी ही है, चाहे वह आम आदमी हो या भिक्षु। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

“भंते जी, मैं श्रद्धा से बना भिक्षु नहीं हूँ। इस यात्रा की परेशानियों से बचने के लिए मैं भिक्षु बन गया। अब मैं कोई श्रामणेर नहीं हूँ। एक आम आदमी हूँ।”

“आयुष्मान, यदि तुम भिक्षु होकर भी शील की रक्षा न कर पाये, तो गृहस्थ आदमी बनकर भी शील की रक्षा नहीं कर सकते । इसलिए इस लाठी का कोना पकड़ने के लिए तुम जैसे किसी व्यक्ति की जरूरत नहीं।”

“भंते जी, ऐसा मत कहिए। इस यात्रा का मार्ग कष्टकारी है। यह अमनुष्य खतरों से भरा है। इसके अलावा, आप अंधे हैं । कोई सहारा नहीं है। आप यहाँ कहाँ रहेंगे?”

“कोई बात नहीं आयुष्मान, तुम उसके बारे में मत सोचो। अगर मैं गिरकर मर भी जाऊँ, तो भी मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा।” कहकर चक्खुपाल भन्ते जी ने यह गाथा कही।

“हंदाहं हतचक्खुस्मि, कांतारद्धानमागतो;
सेय्यमानो न गच्छामि, नत्थि बाले सहायता।

“मैंने अपनी आँखें खो दी हैं। मैं लंबे मरुस्थल के बीच में अकेला पड़ा हूँ। चाहे मैं यहीं गिर जाऊँ, तो भी मैं नहीं जाऊँगा, मुझे पापियों की संगति नहीं चाहिए।

“हंदाहं हतचक्खुस्मि, कंतारद्धानमागतो;
मरिस्सामि नो गमिस्सामि, नत्थि बाले सहायता ति”।

मैंने अपनी आँखें खो दी हैं। मैं लंबे मरुस्थल के बीच में अकेला पड़ा हूँ। चाहे मैं यहीं मर जाऊँ, तो भी मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा, मुझे पापियों की संगति नहीं चाहिए।

वह पापी व्यक्ति काँपने लगा। “अरे! मुझसे बड़ी गलती हो गयी। अनुचित कार्य हो गया।” कहते हुए वह अपने दोनों हाथ बाँधकर रोते हुए चला गया। शक्र देवता का पांडुकंबल शैलासन चक्खुपाल अर्हत जी के शील-गुण की महिमा से गर्म हो गया। शक्र देवता ने उदार जीवन से युक्त उन चक्खुपाल थेर को देखा, जिन्होंने अंधे होने पर भी रास्ता का पता न जानते हुए भी एक पापी व्यक्ति का सहारा छोड़ दिया था और वे अरहंत चक्खुपाल की मदद करने के लिए एक उपासक का वेश धारण कर प्रकट हुआ। जब वे कदमों की आवाज़ के साथ भन्ते जी के पास आये, तो उन्होंने पूछा, “तुम कौन हो?”

“भंते, मैं एक यात्री हूँ।”

“कहाँ जा रहे हो, उपासक?”

“भंते, मैं श्रावस्ती जा रहा हूँ। हमारे भन्ते जी कहाँ पधार रहे हैं?”

“उपासक, मैं भी श्रावस्ती जा रहा हूँ।”

“तो फिर, भंते, आइए मेरे साथ चलिए।”

“नहीं, उपासक, मैं कमज़ोर हूँ। अगर तुम मेरे साथ जाओगे, तो तुम भी मुसीबत में पड़ जाओगे।”

“भंते, ऐसा मत कहिये। मुझे आपकी सेवा करके पुण्य कर्म करने का मौका मिलेगा।” इन बातों से भन्ते जी को महसूस हुआ कि यह आदमी एक सत्पुरुष है। उन्होंने अपनी लाठी का दूसरा कोना नये उपासक को दिया। बहुत दूर जाने से पहले ही किसी शहर का शोर सुनाई देने लगा।

“प्रिय उपासक, यह शोर कहाँ सुनाई दे रहा है? यह कौन सा शहर है?”

“भंते, हम श्रावस्ती आ चुके हैं।” चक्खुपाल भन्ते जी ने सोचा कि ‘यह तो इंसान नहीं हो सकता। जरूर कोई देवता ही होना चाहिए’। तो फिर भन्ते चक्खुपाल के आगमन का समाचार सुनकर भाई उनसे मिलने आया। वंदना किया और विलाप करने लगा। उसकी सेवा करने के लिए एक सेवक को नियुक्त किया गया।

एक दिन बहुत भारी वर्षा हो गयी। जब चक्खुपाल भन्ते जी सुबह-सुबह उठकर टहल रहे थे, तब छोटे-छोटे मेंढ़क उनके पैरों से कुचल गये और मर गये। यह देखकर अन्य भिक्षु इन्हें दोष देने लगे। उन भिक्षुओं ने भगवान बुद्ध जी से इस घटना के बारे में बताया। भगवान बुद्ध ने बताया, “भिक्षुओ, विकारों से मुक्त अरहंत के मन में प्राण – वध की भावनाएँ (चेतना) उत्पन्न नहीं होती।” तब भिक्षुओं ने पूछा कि उन चक्खुपाल भन्ते जी की आँखें क्यों अंधी हो गयीं, जिन्हें निर्वाण प्राप्त करने का सौभाग्य मिला था। भगवान बुद्ध ने काल की रेत में छिपे हुए चक्खुपाल भन्ते जी की अतीत जीवन की कहानी इस प्रकार प्रकट की।

“भिक्षुओ, पूर्वकाल में बनारस शहर में काशी नाम का एक राजा राज्य करता था, तब एक प्रसिद्ध वैद्य आँखों का इलाज किया करता था। उस समय, एक कमजोर आँखेंवाली महिला दवा लेने आयी थी। उसने वादा किया था कि “अरे वैद्य जी, कृपया मेरी आँख को ठीक कर दीजिये। अगर मेरी आँख ठीक हो गयी तो मैं अपने बच्चों के साथ आपकी दासी बन जाउंगी।”

वैद्य इससे खुश था। उसने एक ही दवा से आँखें ठीक कर लीं। जिस औरत की आँखें ठीक हो गयी, उसने ऐसा सोचा कि ‘मैंने इस वैद्य से वादा किया है कि मैं अपने बच्चों के साथ आपकी दासी बनूँगी। पर मैं उसे निभा नहीं सकती। सबसे अच्छी बात यही कहना है कि अभी तक मेरी आँखें ठीक नहीं हुई हैं।’ इस महिला ने वैद्य के सामने बीमार होने का नाटक किया। “ओह वैद्य जी, मुझे अभी भी परेशानी हो रही है। आँखों का दर्द बढ़ता जा रहा है।” वैद्य को पता था कि यह झूठ बोल रही है और यह एक चालाक महिला है और उसे सबक सिखाया जाना चाहिए सोचकर उसने एक ऐसी दवा दी कि जिससे उसकी आँखें अंधी हो जाएँ। “ये दवा दोनों आँखों में डाल लेना। तब तुम ठीक हो जाओगी।” उसने दवा डाली। दवा डालते ही उसकी आंखें अंधी हो गईं, मानो दीपक बुझ गया हो। महिला विलाप करते हुए रोने लगी। भगवान बुद्ध ने बताया उस जनम में वह वैद्य चक्खुपाल ही था। स्वयं द्वारा किया गया कर्म निर्वाण पाने तक पीछे पीछे आकर दुख पहुँचाया। तभी भगवान बुद्ध ने यह गाथा कही।

मनो पुब्बंगमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा।
ततो नं दुक्खमन्वेति चक्कंव वहतो पदं।

अर्थ:
इस जीवन में सभी अकुशल के लिए मन ही मूल होता है। मन ही मुख्य होता है। सभी अकुशल विचार मन से ही उत्पन्न होते है। अगर जो कोई बुरे मन से वाणी से कुछ बोलेगा या शरीर से कुछ कर्म करेगा तो दुःख उसके पीछे-पीछे वैसे ही आते है जैसे बैलगाड़ी के चक्के, बैल के पीछे-पीछे आते है।

तो पुण्यवान सज्जनो, हमें इन धार्मिक उपदेशों से दुष्ट मन की खतरनाक स्थिति को अच्छी तरह समझना चाहिए। इसलिए प्राणियों को मारना, दूसरों की चीजें चुराना, अनैतिक संबद्धता बनाना और शराब पीना जैसे पाप मत करिये। साथ ही साथ झूठ बोलकर दूसरों को धोखा देना, चुगली करके झगड़ा कराना, बुरे और कड़वे शब्द बोलना, गुणवान लोगों की निंदा करना, दूसरों के प्रति ईर्ष्या के कारण झूठी बातें बोलना और व्यर्थ बातें बोलना आदि ये वाणी द्वारा किए जाने वाले पाप हैं। ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, पुण्य-पाप में अविश्वास आदि मन से किये जानेवाले पाप हैं। यदि आप ऐसे मन से पाप करते हैं या पापी शब्द कहते हैं, तो परिणाम आपके पीछे जरूर आएंगे। पापों का परिणाम पीछे पीछे ऐसे आएगा, जैसे गाड़ी में बंधे बैल के पीछे आनेवाले पहिये। अत: पापों से बचना ही सर्वोत्तम है।

धम्मपदट्ठकथा से उद्धृत है

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